अगर समझ जाता मोहब्बत को इतनी असानी से कोई तो मीरा को यु मूरत में समाना न पड़ता

*अगर समझ जाता मोहब्बत को इतनी असानी से कोई तो मीरा को यु मूरत में समाना न पड़ता:-
अगर समझ जाता मोहब्बत को इतनी असानी से कोई तो मीरा को यु मूरत में समाना न पड़ता
अगर समझ जाता मोहब्बत को इतनी असानी से कोई तो मीरा को यु मूरत में समाना न पड़ता 

अगर समझ जाता मोहब्बत को इतनी असानी से कोई तो मीरा को यु मूरत में समाना न पड़ता।


इस तरह काँटे पर चलकर उसे दिखाना न पड़ता ,
और तुम्हारी कसम बाबू ,तुम्हारी कसम  करके युं समझाना न पड़ता। 
अगर समझ जाता मोहब्बत को इतनी असानी से कोई तो मीरा को यु मूरत में समाना न पड़ता।
डूब जाएगा उन आँखों में संभलते -संभलते भी तू ,
बेसक दरियाओं में क्यों न तेर रखा हो ,
और जब रख देगा इश्क़ के राहो में कदम अपनी 
तब पता चलेगा जैसे जल्लादो की बस्ती में पैर रखा हो। 
और मुक़्क़मल करना इश्क़ मेरा ऐ खुदा इबादत भी रोज करेगा तू ,
अंदाजा तो होगा तुझे उसकी बेइंतहाँ मोहब्बत का पर ,
वफ़ा पर कर सक़ उसका शिकायत भी रोज करेगा तू,  
और नहीं करता मोहब्बत आज तो यूँ आँसुओं से हर्जाना न भरता। 
अगर समझ जाता प्यार को इतनी असानी से कोई तो मीरा को यु मूरत में समाना न पड़ता।
अभी उम्र ही कितनी हुई है तेरी ,अभी तो बहुत कुछ जानेगा तू ,
और नहीं करना इश्क़ दोबारा बार -बार यही ठानेगा तू। 
इश्क़ ही खुदा है ,इश्क़ ही रब है ,उसकी शक्ल में भगवान को भी पहचानेगा तू ,
मंजिल भी इश्क़ ,जिंदगी भी इश्क़ और वक्त आने पर शमसान भी इसी को मानेगा तू। 
देकर अग्नि परीक्षा सीता तुझे इज्जत को यूँ गवाना न पड़ता ,
और अगर समझ जाता मोहब्बत को इतनी असानी से कोई तो मीरा को यु मूरत में समाना न पड़ता।
जिल्लत भरी जिंदगी ये देखकर तेरी पलके इतना रो जाएगी ,
सूखा समंदर लेकर किसी के जनाज़े पर होगा तू और आँखे तेरी पत्थर हो जाएगी। 
फिर उन्ही पत्थर आँखों को पिघलाने वो फिर आएगी ,
फिर जज्बातों के साथ फिर से खिलवाड़ होगा ,
उम्मीदें फिर खो जाएगी। 
पलकों पर पहले ख्वाब रखता था ,
अब आंसुओ के कुछ बुँदे रखता है कोई ,
आजकल दरवाजे को करके बंद कसके घर के बाहर ही नींदें रखता है कोई। 
बोलचाल किसी से नहीं है ,कोई दोस्त भी नहीं रखता ,
बस कुछ दुश्मन रखता है पर चुनिंदा रखता है कोई। 
और सारे जहाँ में उड़कर जो वापस आ जाते है ,
मुझे भी दे दो अगर परिंदा रखता है कोई। 
तू भी काबिल होता आज , इंसान होता अगर पागल दीवाना न बनता ,
अगर समझ जाता मोहब्बत को इतनी असानी से कोई तो मीरा को यु मूरत में समाना न पड़ता।
ज़माने के अल्फाज अब समझ नहीं आता , खुद ही से बातें करने लगा हूँ ,
तन्हा ही बैठने में सुकून मिलता है अब तो महफ़िलो में जाने से डरने लगा हूँ। 
लगता है इश्क़ के आखरी पड़ाव को पार करने वाला हूँ ,
क्योकि एक बार नहीं अब में हर रोज मरने लगा हूँ। 
और जाते -जाते भी ये फैसला करना चाहता हूँ ,
बस एक बार देख जाना मुझे,में  तुम्हे देखकर ही मरना चाहता हूँ। 

दोस्तों अगर आपलोगो को ये सायरी पसंद आ रही है तो इसे कृप्या कर के शेयर जरूर कीजियेगा और अगर कोई सुझाव है तो कमेंट कर के हमें जरूर बताइये... धन्यवाद !

Post a Comment

0 Comments