तो क्या वो इश्क़ था ?

 *तो क्या वो इश्क़ था:-

तो क्या वो इश्क़ था ?




तो क्या वो इश्क़ था?
क्योकि कभी जो नजरे मेरा रास्ता देखा करती थी ,
मुझे ही देखकर जीती -मरती थी। 
आज वही नजरे किसी और की नजरों में ,
देखकर प्यार का इजहार कर रही है। 
तो क्या वो प्यार था ?
क्योकि कभी जो जिस्म मेरी बाँहों में आने को तरसती थी ,
मेरे ज़रा सा डांट देने पर उसकी आँखो से बादल सा बरसता था,
आज वही जिस्म किसी और की बाहों में है। 
और आज भी में उसे भुला नहीं हूँ ,
क्योकि  आज भी वो चेहरा मेरी निगाहों में है। 
तो क्या वो इश्क़ था?
क्योकि कभी जिन पलकों का सवेरा तब तक नहीं होता था ,
जबतक वो हमारा दीदार न करती थी,
कही उसकी ज़रा -ज़रा सी नादानियों से तंग आकर में उसे छोड़ न दू ,
इस बात को लेकर हर पल डरती थी।
आज उसकी हर सुबह की वजह सूरज की कुछ किरणे ,
और किसी और शक्स का चेहरा बन गया है। 
तो क्या वो इश्क़ था?
क्योकि कभी तुम मुझमें अपनी बांहे डालकर मेरी बाइक के पिछले सीट में बैठा करती थी ,
मेरे कंधे पर तेरा सर होता था और तेज हवाएं तुम्हारी जुल्फों को छूकर गुजरती थी,
 पर न जाने क्यों हवाओं के बजाए तुमने अपना रुख मोड़ लिया।
 तो क्या वो इश्क़ था?
तेरे ONLINE होने पर भी तेरे जवाब न देने पर ये समझ  के में पल -पल मर रहा था ,
की कही तू किसी और की तो नहीं होने जा रही थी इस बात को लेकर हर पल डर रहा था। 
आँखे आँसू बहा रही थी और में दिल को बहलाने का काम कर रहा था , ये इश्क़ हीं तो था। 
अब दिल महफ़िलो से डरने लग गया है ,
आँखे किसी और से मिलने से पहले ही पीछे हट जाती है। 
खुदा तुझे भी एक दिन ऐसा दिखाए ,
क्योकि तुझे भी तो पता चले की भिगे हुए तकये पर रात कैसे कटती है। 
कैसे छुप -छुपकर रोया जाता है,
कैसे पलकों के साथ -साथ हाथो को भी भिगोया जाता है। 
तुझसे इतना प्यार करते हुए भी तुझे तड़पाने के बारे में सोचकर आँखे भर तो आती है मेरी ,
लेकिन में भी क्या करु जहां इतनी मोहब्बत होती है वहां हद से ज्यादा नफरत हो ही जाती है। 



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