अनसुनी सी एक दास्तां सुनाऊ आज तुमको , क्या है ये इश्क़ बताऊ आज तुमको

 *अनसुनी सी एक दास्तां सुनाऊ आज तुमको , क्या है ये इश्क़ बताऊ आज तुमको:-

अनसुनी सी एक दास्तां सुनाऊ आज तुमको , क्या है ये इश्क़ बताऊ आज तुमको।


अनसुनी सी एक दास्तां सुनाऊ आज तुमको ,
 क्या है ये इश्क़ बताऊ आज तुमको। 
उसको तो बताने में नाकाम रहा शायद ,
पर अल्फाजों से अपनी मोहब्बत जताऊ आज तुमको। 
क्यों दिल का तड़पना जरुरी सा हो जाता है ,
क्यों ये इश्क़ को पाना फितूरी सा हो जाता है। 
और मेने देखा है वो इंसान भी जो पत्थर दिल कहता था खुद को ,
आज भरी महफ़िल में हसते -हसते रो जाता ,बैठे -बैठे खो जाता है। 
रातों में ली गई हर सिसकीयों की आवाज सुनाऊ में आज तुमको ,
और क्या है ये इश्क़ आओ बताऊ आज तुमको। 
मेरा प्यार ,मेरा इश्क़ ,मेरी मोहब्बत मुझे मिल जाए -मुझे मिल जाए 
हर सक्स कह रहा है ,
पर या तो फ़रयादें बददुआ बनकर लोट आती है लगता है मेरा खुदा ही बहरा हो गया है। 
और मोहब्बत के सारे पहलू गिनाऊ आज तुमको ,
क्या है ये इश्क़ बताऊ आज तुमको। 
कोई अपना प्यार हासिल करने के लिए अगले जनम तक रुक जायगा ,
तो किसी का प्यार दबा रह जायगा ज़माने के वसूलों के निचे। 
संभलकर यार संभलकर चलना ये इश्क़ में हर कदम ,
लगता है किसी ने कांटे बिछा रखे है फूलों के निचे। 
आशिको को रोते हुए कभी कंधो का तो ,
कभी गेट का सहारा लेते देखा है। 
और बस एक बात पूछना था मुझे उसकी हर सांसो की बेवफ़ा रवानी से ,
किसी और की बदौलत दी गयी उसकी जिस्म पर हर निशानी से ,
आखिर मेरा ही नाम क्यों मिटाया अपनी कहानी से। .
और आओ एक दास्तां सुनाऊ आज तुमको ,
क्या है ये इश्क़ ये बताऊ तुम्हे। 
 

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