बहू भी तो बेटी होती है...!

*बहू भी तो बेटी होती है:-

बहू भी तो बेटी होती है कोई क्यों समझ न पाता है



 नहीं करनी मुझे शादी न होना मुझे पराई है ,
कैसे में तुमसे दूर रहूँगी माँ जब सोच आँख भर आई है। 
सुनकर बेटी की बात माँ धीरे से मुस्काती है ,
पास बुला बैठा प्यार से उसको कुछ समझाती है। 
ये रित पुरानी है बिटियाँ जिसे हर सबको निभाना पड़ता है ,
आज नहीं तो कल बेटी को अपने घर जाना ही पड़ता है। 
ये सिर्फ तुम्हारी नहीं यहां हम सबकी यही कहानी है ,
जिसे बड़ा किया अरमानों से वो बेटी एक दिन बिहानी है। 
अपनी छमता से ज्यादा हम बर तुम्हारा ढूंढेंगे ,
कह रही हो जिन्हे पराया हम सबसे ज्यादा खुश तुम्हे रखेंगे। 
और इस घर से जितना स्नेह मिला उस घर को भी उतना ही देना ,
कोई गुस्से में कुछ कह भी दे तो भी तुम दिल पर मत लेना। 
जो आभूषण जहाँ के लिए बना हो उसी जगह पर सजता है ,
और नए लोगो के बिच जगह बनाने में बिटियां वक्त थोड़ा तो लगता है। 
डोली में कर रहे बिदा अब सर्थी में वापस आना ,
कभी ह्रदय आहत भी हो तो भी तुम खुद-ही-खुद को समझाना। 
धीरे-धीरे एक दिन तुम उस घर के रंग में रंग जाओगी ,
इस घर के लिए पराई और उस घर का हिस्सा बन जाओगी। 
ठीक है माँ , तेरी सारी बातों को गांठ बांधकर में संग अपनी ले आई थी ,
पर न जाने क्यों इस घर में भी और उस घर में भी में ही पराई थी। 
हर काम में करना चाहती हूँ , जो मुझे नहीं भी आता ,
पर थोड़ी सी गलती हो जाना जैसे यहाँ गुनाह हो जाता है। 
क्या यही सिखाया है माँ ने तुम्हारी हर रोज मुझसे सब कहते है ,
सब छोड़ आयी जिनकी खातिर वो भी अक्सर चुप रहते है। 
सुबह-सवेरे जल्दी उठकर हर काम में अपना निपटाती हूँ ,
कोशिश करके हार गयी माँ पर मन सास का न जित पाती हूँ। 
समझाया था तुमने जैसा वैसा तो कुछ भी न पाती हूँ ,
हर रोज आँखे नम होती है , हर रोज ह्रदय भर आता है ,
बहू भी तो बेटी होती है कोई क्यों समझ न पाता है।
कहने को तो हर रिस्ता अपना पर अपनेपन से कोशो दुरी है ,
ये कैसी रीत है दुनियाँ की माँ कैसी मेरी मज़बूरी है। 
न जाने कब तक ये घर मुझे पुरे मन से आपनायेगा ,
जो प्यार मिला माँ-पापा से क्या कभी यहाँ मिल पायेगा ? 

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