वो न जाने कब गैरो के होना होना सिख गए।

*वो न जाने कब गैरो के होना होना सिख गए:-  

वो न जाने कब गैरो के होना होना सिख गए।


वो प्यार मोहब्बत के अकीदतमंद बड़ी जल्दी नफरत करना सिख गए ,
हम तो उनके थे उन्ही के रहे और वो न जाने कब गैरो के होना होना सिख गए। 
हम नावाकिफ थे इस बात से की वो अजनबी इस कदर हो जायेंगे ,
नजर आते थे जो मेरे फ़ोन के हर गलियारों में ,
अब वो बस एक फोल्डर में सिमट कर रह जायेंगे। 
हम नावाकिफ थे इस बात से की वो इस रिश्ते को इतनी बेरहमी से तोड़ जायेंगे ,
की हमे सबसे पहले जवाब देने वाले हमारा MESSEGE SEEN करके छोड़ जायेंगे। 
हम शहरों-शाम मुलताजिर(इंतजार करना) रहे उनके जवाबो के ,
और वो किसी और-ए-महफिले CHAT में REPLY करना सिख गए,
हम उनके थे उन्ही के रहे और वो न जाने कब गैरो के होना सिख गए। 
और जब बड़े दिनों बाद हमसे पूछा हाल-ए-दिल उन्होंने ,
तो भाई हम भी खुद्दार थे मुस्कुराकर झूठ बोलना सिख गए। 
हम तो उनके थे उन्ही के रहे और वो न जाने कब गैरो के होना सिख गए। 
हम नवाकिफ़ थे इस बात से की लोग बदल भी जाया करते है ,
वो आँखों में आँखे डाल किये वादों से मुकर भी जाया करते है। 
अरे सदायें(आवाजें) आती थी जिनको हमारे सीने से,
 अब वो किसी और से लिपटना सिख गए।
और दिल में आसियान बनाया था जिन्होंने अब गुजरते है,
 सामने से तो वो नजरें चुराके चलना सिख गए ,
हम उनके थे उन्ही के रहे और वो न जाने कब गैरों के होना सिख गए।
हम नवाकिफ़ थे इस बात से की वो चेहरों को साफ और दिल  मैला रखते है ,
कुछ लोग हसीन ऐसे भी होते है जो खिलोनो से नहीं जज्बातों से खेला करते है। 
अरे हम आशिक नादान थे की ताजिंदगी भीतर-बाहर एक से रहे ,
और वो कम्बख्त बेवफाई करते-करते रोजाना यार बदलना सिख गए। 
हमने उनके साथ आकाश के सपनें देखा करते थे ,
पर जब हुई हकीकत से रूबरू तो वो मेरे सपनो को कुचलना सिख गए ,
हम उनके थे उन्ही के है और वो न जाने कब वो गैरो के होना सिख गए। 
हम नवाकिफ़ थे इस बात से की कभी वक्त हमारा इतना खिलाफ हो जाएगा ,
की उनकी मेहंदी में चुपके से बनाए वो R अक्छर इस कदर साफ हो जायेगा। 
हम तो उनके नाम का हर्फ़(अक्छर) हथेली पे नहीं दिल पे लिखना चाहते थे ,
इसलिए दर्द होता रहा हर्फ़ बनता रहा और हम दिल को कुरेदना सिख गए,
हम उनके थे उन्ही के है और वो न जाने कब वो गैरो के होना सिख गए।
हम उनपे मर के जीना चाहते थे ,
हुए अलग जबसे उनसे जीते-जी मरना सिख गए। 
हम नावाकिफ थे इस बात से की वो हमारे बिना भी रह सकते थे ,
जो फ़साने उन्होंने हमसे कहे थे उतनी ही सिद्दत से किसी और से भी कह सकते थे ,
अरे हमने तो सोना समझ यूँ पकड़ रखा था उनको ,
और वो कमवख्त धूल से निकले की इतमिनान से फिसलना सिख गए ,
हम कुछ देर जो दूर हुए उनसे तो क्या उसने हमारे बिना ही रहना सिख गए ,
हम उनके थे उन्ही के है और वो न जाने कब वो गैरो के होना सिख गए।


 

 

Post a Comment

0 Comments