औरत है वो कोई मज़ाक नहीं !!!

 औरत है वो कोई माजाक नहीं:-

औरत है वो कोई मज़ाक नहीं !!!


सुख में  तो वो सब के संग होती है ,
पर दुःख में वो अकेले रह जाती है,
दुनियां की नजरों में वो कुदरत की करिश्मा कहलाती है। 
परिचय का मोहताज नहीं वो खुद अपनी जुबानी कहती है ,
रामायण और महाभारत से ग्रंथो में वो अबला नारी बन के रह जाती है। 
औरत वो भिक्षा है पांडवो की जो  आपस में बाँट दी जाती है ,
पुरुष प्रधान इस दुनियां में फिर जुआ  में हर दी जाती है। 
औरत वो सीता है राम की जो रावण द्वारा चुरा ली जाती है ,
फिर अग्नि परिक्षा भी वही है जो माटी में समा दी जाती है। 
आने वाले युगों के लिए एक इतिहास बना दे जाती है ,
पर कौन है वो? , क्यों ऐसी है?
वो खुद से ये प्रश्न बार-बार दोहराती है। 
औरत वो आग है सीने की जिसको चूल्हो में झोक दी जाती है ,
आँखों में उड़ने का ख्वाब लिए पिंजरे में डाल दी जाती है। 
उठना जो चाहती  है वो फिर से तो पैरो से रोंदी जाती है ,
लाख प्रतिभा हो उसमे पर हर कदम पे रोकी जाती है। 
औरत कली है उस उपवन की जो खिलते ही तोड़ ली जाती है ,
कभी मस्तक तो कभी चरणों में बस यु ही चढ़ा दी जाती है। 
खुद से ही जन्म देने वाली इस दुनियां में वो खुद को ही असुरक्षित पाती है,
औरत वो खामोशी है आँगन की जो हर रातो में चिल्लाती है। 
हवस भरी इस दुनियां में हर रोज वो बेचीं जाती है ,
फिर लक्ष्मी का वो रूप भी है जो घर-घर में पूजी जाती है। 
पर कौन है वो ? क्यों ऐसा है ?
खुद से ये प्रश्न दोहराती है। 
क्यों वो आगाज नहीं ? क्यों वो आवाज नहीं ?
क्यों वो सिर्फ एक जरिया है आते-जाते चंद लोगो का ?
क्यों वो सिर्फ एक नजरिया है ?
क्यों सौर भरे इस दुनिया में मन में सिमटी एक ख़ामोशी है ?
इनके इन हालातो की शायद औरत खुद भी उतनी ही दोषी है ,
पर एक बात कहु में ऐ-दुनियाँ औरत भी हमारे ही जैसी है। 
वो बेचैनी है उस मन की जो चेन से जीना चाहती है ,
वो ख़्वाब है उसके आँखों का जो पूरा होना चाहती है ,
और अब थक चुकी है  अब इन रूपों से,
अब वो खुद को पाना चाहती है। 
औरत है वो कोई मजाक नहीं और औरत बन जीना चाहती है ,
उसके खुद से पूछे  प्रश्नो का एकमात्र ये उत्तर पाती है। 
उसके सारे सपनो संग अब वो नभ में उड़ जाना चाहती है...
नभ में उड़ जाना चाहती है। 


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