में तुझसे दूर जा के भी दूर जा नहीं पाया

 *में तुझसे दूर जा के भी दूर जा नहीं पाया:-

में तुझसे दूर जा के भी दूर जा नहीं पाया।


में तुझसे दूर जा के भी दूर जा नहीं पाया। 
किया कोशिश मगर में लौटकर भी वापस आ नहीं पाया। 
कुछ बेरुखी मेरे बर्ताव में थी , कुछ तू भी गुरुर के नाव  थी ,
दरियां मोहब्बत का बहता रहा मगर कमी तो थामी उस पतवार में थी। 
बस हिचकोले खाता रहा कस्ती हमारी हम चाह कर भी किनारे तक आ नहीं पाए ,
में तुझसे दूर जा के भी दूर जा नहीं पाया। 
किया कोशिश मगर में लौटकर भी वापस आ नहीं पाया। 
किया कोशिश तो बहुत मेने तुझे भुलाने की ,
खाया था सौगंध भी मेने तेरे करीब न आने की। 
तेरी यादों के साये से खुद को दूर रखा था ,
न आऊं होश में इसलिए खुद को नशे में चूर रखा था। 
में हर उस दुःख को तकलीफ को अपना बनाता था ,
जो मुझको आइना बन जिंदगी का सच दिखता था। 
में तेरी बत्तमीजी ,बेवफाई याद करके भी कभी नफरत तेरी सूरत से मन में ला नहीं पाया ,
में तुझसे दूर जा के भी दूर जा नहीं पाया। 
किया कोशिश मगर में लौटकर भी वापस आ नहीं पाया। 
में सोचता था खुश है तू मेरे जाने से ,
अब तुम जो चाहो कर सकती हो इस बहाने से ,
न कोई रोकेगा तुम्हे और न कोई टोकेगा अब कैसा डर इस ज़माने से ,
की अब तू हो चली है सख्त दिल के चोट खाने से ,
नहीं मालूम था इस कदर तू खुद से रूठ जाएगी। 
में तेरे आँखों से बहते हुए वो अस्क देखा फिर ,
हसी झूठी-फरेबी इन लबों पर ला नहीं पाया ,
ख़त्म कर सारी उम्मीदें बढ़ाई थी कदम आगे ,
अकेले ही चलेंगे अब हो सफर में फूल या काँटे ,
नहीं मालूम था क्या किस्मतो को रास आएगा ,
की रास्ता मुड़ जायगा और तुम्हारे पास ले आएगा। 
में हर दर खट-खटाया सब रिश्ते आजमाया दुनियां को भी भुलाया ,
खुद को मिटाया ,बहुत ढूंढा सुकून जो था तेरी बाँहों में फिर से ला नहीं पाया। 
और में तुझसे दूर जा के भी दूर जा नहीं पाया। 
किया कोशिश मगर में लौटकर भी वापस आ नहीं पाया। 

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