माँँ-एक अनसुलझी पहेली...!

Hindi Poetry में आप सभी लोगो का स्वागत है , दोस्तों अगर आपलोगो को Poetry पढ़ना अच्छा लगता है तो आप बिलकुल सही वेबसाइट पर आये है। हमारे वेबसाइट में Hindi me Kabita,Poems of Life in HindiLovers Life Poem in Hindi, Breakup Poems in Hindi  इन सभी Topics के ऊपर हिंदी में कबिताएँ होती है।  हाँ तो दोस्तों आज की ये Poetry हैै,
वो एक माँ के लिए हैं जिसकी पहेली आज तक अनसुलझी है।
वो बिना किसी स्वार्थ के हमे सबकुछ देती हैं चाहे वो प्यार या ममता तो आइए देखते हैं कि हमारी माँ हमारे लिए कितना कुछ करती हैं और हम बदले में उन्हें क्या देते हैं।

*माँँ-एक अनसुलझी पहेली:-

माँँ-एक अनसुलझी पहेली...!


 जब आंख खुली तो बस अम्मा की गोदी का एक सहारा था,
उसकी प्यारा सा आंचल मुझको भूमंडल से प्यारा था,
उसके चेहरे की झलक देख चेहरा फूलो सा खिलता था,
उसके आंचल की एक बूंद से मुझको जीवन सारा मिलता था।
हाथों से बालों को नोचा पैरो से खूब प्रहार किया,
फिर भी उस माँ ने पुचकारा हमको जी भर के प्यार किया,
में उसका राजा बेटा हूँ वो आँख का तारा कहती हैं,
में बनू बुढ़ापे में उसका सहारा बस इतना ही कहती हैं,
उंगली को पकड़ चलाया उसने ही पढ़ने भेजा है,
मेरी सारी नादानी को भी निज अंदर में सदा सहेजा है,
मेरे सारे प्रश्नों का वो फोरन जवाब बन जाती हैं,
और मेरी राहों के कांटो को चुन वो खुद गुलाब बन जाती हैं।
जब में बड़ा हुआ तो कॉलेज से एक रोग प्यार का ले आया,
जिस दिल में माँ की मूरत थी वो किसी रामकली को दे आया,
शादी की पति से बाप बना अपने रिश्तों में झूल गया,
अब करवा चोत मनाता हूं माँ की ममता को भूल गया।
हम भूल गए उसकी ममता मेरे जीवन की गलती थी,
हम भूल गए अपना जीवन वो अमृत वाली छाती थी,
हम भूल गए वो खुद भुखे रहकर हमे खिलाया करती थी,
हमको सुखा बिस्तर देकर वो खुद गीले में सोती थी,
हम भूल गए उसने ही इन होठों को भाषा सिखलाई थी,
मेरी नींद के लिए रात भर उसने लोरी गाई थी,
हम भूल गए हर गलती पर उसने हमे समझाया था,
बचा रहु बुरी नजरों से में इसलिए तो काला टीका लगाया था।
पर अब हम बड़े हुए तो ममता वाले सारे बंधन तोड़ आए,
बंगले में कुत्ता पाल लिए माँ को वृद्ध आश्रम छोड़ आए,
उसके सपनों का महल गिराकर कंकड़-कंकड़ बिन लाए,
खुदगर्जी में हम उसके सुहाग के आभूषण तक छीन लिए,
हम माँ के घर के बटवारे की अभिलाषा तक ले आए,
उसकी पावन मंदिर से गाली की भाषा तक ले आए।
माँ की ममता के कारण मोत भी आगे से हट जाती है,
अगर माँ अपमानित होती हैं तो धरती की छाती फट जाती हैं,
अपने घर को सारा जीवन देकर बेचारी माँ क्या पाती हैं,
रूखा-सूखा खा लेती हैं और कभी पानी पीकर सो जाती हैं,
जो माँ जैसी देवी को मंदिर में नही रख सकते हैं,
वो लाखों पुण्य भले कर ले इंसान नही बन पाते हैं।
माँ जिस पौधे को जल दे दे वो पोधा संपूर्ण बन जाता है,
माँ के चरणों को छूकर तो पानी भी गंगाजल बन जाती हैं,
माँ के आंचल ने ही युगों-युगों से भगवान तक को पाला है,
माँ के चरणों में ही जन्नत, गिरजाघर और शिवालय हैं।
माँ कबीरा की साखी जैसी, माँ तुलसी की चौपाई हैं,
मीरा की पदावली जैसी, खुसरो की अमर रूबाई हैं,
माँ आँगन की तुलसी जैसी, पावन बरगद की छाया है,
माँ बेद ऋचाओं की गरिमा है, माँ ही महाकाब्यो की काया है,
माँ मानसरोवर ममता का, माँ ही गौमुख की ऊंचाई है,
माँ परिवारों का संगम है, माँ ही रिश्तों की गहराई है।
माँ हरी दूब है धरती की, माँ ही केसर वाली क्यारी हैं,
माँ की उपमा केवल माँ हैं, माँ हर घर की फुलवारी है।
सातों सुर नर्तन करते जब कोई माँ लोरी गाती हैं,
माँ जिस रोटी को छू लेती हैं वही प्रसाद बन जाती हैं,
माँ हंस दे तो धरती का ज़रा-ज़रा मुस्काता हैं,
और अगर देखे दूर क्षितिज अम्बर धरती को शीश झुकता है।
माना मेरे घर की दीवारों में चंदा सी सूरत है,
पर मेरे मन के मंदिर में बस केवल मेरी माँ की मूरत है,
माँ सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, अनुसुइया, मरयम और सीता है,
माँ पावनता में रामचरित्रमनस हैं और माँ ही भागवत गीता है।
माँ तेरी हर बात मुझे वरदान से बढ़कर लगती हैं,
हे माँ तेरी सूरत मुझको भगवान से भी बढ़कर लगती हैं,
सारे तीर्थ के पुण्य जहां में उन चरणों में लेता हूं,
जिनके कोई संतान नहीं में उन माओँ का बेटा हूं,
हर घर में माँ की पूजा हो में ऐसा संकल्प उठाता हूं,
में दुनियां की हर माँ के चरणों में ये शीश झुकता हूं।


 अगर कविता अच्छी लगी हो तो इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि ये संदेश सभी तक पहुंचे और कोई माँ
फिर से वृद्ध आश्रम ना जा पाए।
धन्यवाद

Post a Comment

0 Comments